भारत में आजकल दो ही बातों की धूम है। एक है डेरा सच्चा सौदा के प्रमुख गुरमीत राम रहीम को सजा, और दूसरी है गणेश उत्सव। दोनों की घटनाएं आस्था से जुड़ी है। जहां एक और डेरा सच्चा सौदा के प्रमुख गुरमीत राम रहीम को सजा मिलने के बाद डेरा प्रेमी मायूस हैं वही दूसरी ओर गणेश उत्सव मनाए जाने वालों की दुनिया हर्ष उल्लास में है।
भारत वासियों की आस्था भी बहुत अजीब है। कहीं तो यह अपने आस्था के चलते आरोपी बाबा के समर्थन में सड़कों पर उतर आते हैं तो कहीं अपनी आस्था के चलते भगवान को भी खंडित विखंडित छोड़ देते हैं।(देखें चित्र)
गणेश उत्सव के बारे में मान्यता यह है कि इन दिनों श्री गणेश धरती पर उतर आते हैं इसलिए श्री गणेश की मूर्ति स्थापना की जाती है । दस दिन की पूजा के बाद गणपति जी की मूर्ति का धूमधाम से हर्ष व उल्लास से शोभायात्रा निकाल कर जल विसर्जन कर दिया जाता है। मान्यता यह है कि दस दिन तक धरती पे रहने के बाद विसर्जन के रूप में गणपति जी की विदाई की जाती है ।
यहाँ तक तो ठीक है। पर्व मना लिया, गणपति जी की स्थापना हो गई, पूजा हो गई, विसर्जन भी हो गया, अब इसके बाद ?
मूर्ति विसर्जन के बाद गणपति जी की मूर्ति लहरों के सहारे खंडित रूप में समुद्र के किनारे आ लगती है। ( देखें चित्र)
यहीं पे आ के आस्था पर प्रश्नचिन्ह लग जाता है। क्या भक्तों की आस्था केवल हर्षोल्लास श्री गणेश उत्सव मनाने व विसर्जन तक ही सीमित है ? जिस मूर्ति में वो 10 दिन तक भगवान के दर्शन पाते हैं, पूजा करते हैं और आशीर्वाद पाने के लिए लालायित रहते हैं, उन्हीं श्री गणेश की मूर्ति को विखंडित रूप में लहरों किनारे क्यों छोड़ दिया जाता है ?
10 दिन तक जो मूर्ति भगवान का रुप होती है, जिसके आगे झुक कर लोग आशीर्वाद लेते हैं, वह मूर्ति का विसर्जन के बाद मिट्टी की मूरत रह जाती है ? और मिट्टी भी क्यों, आज तो न जाने किस किस पदार्थ से भगवान की मूर्ति बनाई जाती है । जब यह त्यौहार शुरू हुए तो गणपति जी की मूर्ति मिट्टी व जल में घुलनशील पदार्थों से बनायी जाती थी। विसर्जन के बाद ये पदार्थ जल में ही घुल जाते थे। अर्थात पर्यावरण को भी कोई नुकसान नहीं होता था । लेकिन समय के साथ साथ ये मूर्तियाँ घुलनशील नहीं रही। पर्यावरण के नुकसान के साथ साथ लहरों के किनारे यह खंडित मूर्तियां भगवान का भी अपमान है।
आज जरूरत इस बात की है कि उत्सव को हर्षोल्लास से मनाया जाने के साथ इस बात का भी ध्यान रखा जाए की मूर्तियां जल में ही विमग्न हो जाएं। साथ ही साथ मूर्तियों को भी दिखावे के लिए बहुत बड़ा ना बनाया जाए। त्योहार को मनाने के साथ साथ भगवान की गरिमा का भी पूरा ध्यान रखा जाए। तभी भगवान गणपति भक्तों से प्रसन्न होकर आशीर्वाद देंगे।




Ganpati Baba Morya
जवाब देंहटाएंLet us change our way to celebrate the festival
जवाब देंहटाएं😓
जवाब देंहटाएंआस्था स्वरूप भगवान को स्थापित करना , पूजन करना गलत नहीं अपितु पूजन के बाद विसर्जन के बाद इस तरह का अपमान असहनीय व घोर पापकर्म है । मूर्ति घुलनशील होनी आवश्यक है ।
जवाब देंहटाएं