भारतीय न्याय व्यवस्था - आशा की नई किरण



तमाम विरोधाभासों के बावजूद भारतीय न्यायालयों द्वारा हाल ही में किए गए निर्णय एक आशा की किरण जगाते हैं।  सर्वोच्च न्यायालय ने तीन तलाक पर प्रतिबंध  लगाकर मुस्लिम समाज में फैली कुप्रथा के ऊपर अंकुश लगा कर मुस्लिम महिलाओं को बराबरी का अधिकार दिलाया है।  और उन्हें अन्य  भारतीय महिलाओं के समकक्ष अपने समाज में इज्जत के साथ जीने का अवसर प्रदान किया है।ये मुस्लिम महिलाओं के लम्बे सघंर्ष का एक सुखद परिणाम है।


            तीन तलाक के फैसले के अगले ही दिन एक और फैसला आया। ये फैसला आम नागरिक के लिए निजता का अधिकार ( Right of Privacy) लेकर आया। ये फैसला सीधे ही सरकार के 'आधार' कार्यक्रम पर चोट करता है। इसके अनुसार आधार के लिए किसी भी व्यक्ति को बायोमेट्रिक वेरिफिकेशन (Finger print verification) के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता। अब यह देखना दिलचस्प होगा कि अब आधार के लिए सरकार किस तरह से सुप्रीम कोर्ट से स्वीकृति ले पाएगा।


         इन दोनों फैसलों  पर बुद्धिजीवी  और मीडिया अभी कुछ विवेचना करते इससे पहले ही एक और महत्वपूर्ण घटना घटी जिसने कि मीडिया और बुद्धिजीवी वर्ग के साथ साथ पूरे भारत का ध्यान अपनी ओर खींच लिया। और यह घटना थी - डेरा सच्चा सौदा के प्रमुख गुरमीत राम रहीम की गिरफ्तारी और सजा। 25 अगस्त को गिरफ्तारी से लेकर 28 अगस्त को सजा सुनाई  जाने तक के नाटकीय घटनाक्रम मैं अंततः जीत कानून की हुई ।

           इन तीनों ही फैसलाें में असल जीत जनता की है, समाज की है और न्यायपालिका की जीत है।  निजता का अधिकार (Right of Privacy) सरकार की निरंकुशता को रोकता है तो ट्रिपल तलाक के संबंध में न्यायालय मुस्लिम समाज में फैली पुरुषों में फैली मानसिकता पर रोक है । ये वो मानसिकता है  जिसके चलते मुस्लिम पुरुष कभी भी सिर्फ शौक के आधार पर भी अपने पत्नि को तलाक तलाक तलाक कह कर सदा के लिए छोड़ सकते थे। मुस्लिम महिला कोई भी विरोध नहीं कर पाती थी । सुप्रीम कोर्ट के इस निर्णय के बाद मुस्लिम महिलाएं इस अन्याय पूर्ण मानसिकता के खिलाफ अपनी आवाज उठा सकती हैं । कुछ समय बाद जब यह कानून पूरी तरह से प्रभावी हो जाएगा धीरे धीरे मुस्लिम समाज में पुरुषों में भी इस तरह का माहौल तैयार होगा कि वह अपनी पत्नी के हक को समझें और केवल ठोस कारण के आधार पर ही तलाक के बारे में सोचे। सुप्रीम कोर्ट के इस निर्णय के बाद मुस्लिम महिलाओं में भय मुक्त जीवन जीने की एक नयी आशा की किरण जागी है। 

         अब बात करते हैं उस फैसले की, जिसने मीडिया जगत और तमाम बुद्धिजीवी वर्ग  के साथ साथ आम लोगों को भी यह विश्वास दिलाया है कि देश के कानून से ऊपर कोई नहीं। डेरा सच्चा सौदा के प्रमुख गुरमीत राम रहीम क नाम अति प्रभावशाली व्यक्तियों में शामिल था। उनके अनुयायियों की संख्या भी करोड़ों में बताई जाती है। देश के बड़े बड़े गणमान्य व्यक्तियों के साथ उनके चित्र अब इंटरनेट की दुनिया में वायरल हो रहे हैं। यहां तक कि एयरपोर्ट में भी सरकारी सूचनाओं में उनका नाम अति विशिष्ट व्यक्तियों में शामिल था (देखें चित्र प्रतिलिपि - क्रम संख्या 51)

        क्या कोई मान सकता है कि  डेरा प्रमुख के मामले में कोई दबाव नहीं डाला गया होगा ? धन शक्ति से लेकर बड़े-बड़े राजनेताओं से संपर्क रखने वाले बाबा गुरमीत राम रहीम - जिन के अनुयायियों की संख्या के वोट बैंक के आधार  पर -  बड़ी राजनीतिक पार्टी के नेता उनके खिलाफ अभी भी कोई टिप्पणी करने से डरते हैं, ऐसे बाबा गुरमीत राम रहीम के खिलाफ फैसला सुनाना न केवल एक साहसिक निर्णय रहा, अभी तो यह आम जनमानस के मानस पटल पर यह संदेश देने में भी सक्षम रहा भारत में अभी भी न्याय प्रणाली जिंदा है। 
          यही कानून की जीत है। न्याय की जीत है और जनता की जीत है।उम्मीद की जानी चाहिए  कि भविष्य में भी भारतीय न्यायालय निष्पक्ष ग्रुप से अपना कार्य करते हुए  जनहित में कार्य करते रहेंगे। 
                            जय हिंद  -  जय भारत

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